गौ सेवा

गौसेवा के अन्तर्गत भारतीय गौमाता का संवर्धन एवं संरक्षण (शोषित,लंगड़ी,लूली,अंधी, समाज द्वारा बहिस्कृति गौमाता की देखभाल) करना एवं उनकी सेवा करना तथा उनसे प्राप्त पंचगव्य (गोबर,गौजल,ढूध,दही,घी) से दैनिक उपयोगी वस्तुओ का निर्माण करना तथा उत्पादों को मूल्य संवर्धित कर उत्पाद को जरुरतमंदो तक पहुचाने का मुख्य कार्य है, इन कार्यो से गौमाता की सर्वोताम सेवा होती है और हम गौमाता पर आश्रित है| गौमाता अपने आशीर्वाद स्वरुप हमें गोबर और गौमूत्र देती है| चारों वेदों में गोमाता का सन्दर्भ 1331 बार आया है| ऋग्वेद में 723 बार, यजुर्वेद में 87 बार, सामवेद में 170 बार और अथर्ववेद में 331 बार, गाय का विषय आया है| इन वेद मत्रों में गोमाता की महत्ता, उपयोगिता, वात्सल्य, करूणा और गोरक्षा के उपाय तथा गो से प्राप्त पंचगव्य पदार्थो के उपयोग और लाभ का वर्णन है| वेदों में गाय के लिए गो, धेनु और अघ्न्या ये तीन शब्द आये हैं| वेदों को समझने के लिये छः वेदांग शास्त्रों में से एक निरुक्त शास्त्र है| इसमें वैदिक शब्दों के अर्थो को खोलकर बताया गया है जिसे निर्वचन कहते हैं| ‘हन हिंसायाम् ’ धातु से हनति, हान आदि शब्द बनते हैं जिसका अर्थ हिंसा करना मारना है| गाय को अघ्न्या कहा है अर्थात् जिसकी कभी भी हिंसा न की जाये| शतपथ ब्राह्मण में (7/5/2/34) में कहा गया है-सहस्रो वा एष शतधार उत्स यदगौ: अर्थात भूमि पर टिकी हुई जितनी जीवन संबंधी कल्पनाएं हैं उनमें सबसे अधिक सुंदर, सत्य, सरस, और उपयोगी यह गौ है| इसमें गाय को अघ्न्या बताया गया है| तो अगर छोटे रूप में देखें तो यह वेदों में गाय का महत्व है|